Sankalp @ IIMB

It feels good to become a part of a change, but it takes a lot of courage for some one to initiate a change. We all have one or many things in our minds that we want to change in the society we are part of.

We three, too had lot of things in mind but couldn’t start earlier but we finally made at-least one such thing possible out of those many by taking a small step towards a change in the society.

It was an awesome feeling when we finally launched our campaign- “Sankalp: An electricity saving initiative by the IIMB students“, It took a lot of efforts and support of many people that made this Sankalp to happen at right time and at a right platform.

This initiative is a very small step in the direction of saving electricity by changing in our behavior, and why it is very small because in the end it only talks about switching off lights and fans when they are not in use, but it goes beyond that, Long term vision of this campaign is to curb the wastage in electricity by spreading awareness and promoting self-regulation with small initiatives, to cater long-term sustainability for oneself and the society at large. The awareness would enable in significant (about 8-10%) savings in electricity. It would also enable us to meet the our vision of self-sufficiency in our institutions.

Once discussing among our teammate about this, some of us mentioned about human nature of all of us which resist the change but we knew one thing even if one person gets changed from this initiative, its worth for us for going ahead with this campaign.

We team Sankalp urge all of you who are reading this post in my blog to make Sankalp today to change in your behavior to save the electricity by making contribution in anyway you can.

Support us to spread this message to as many people as possible.

Be a part of any change once in a while in you life!!!

Sankalp

Thank you team Sankalp (Rajendra and Tirthesh) for working hard on this initiative.

 

 

 

 

Alfaaz-e-Dila

तुम्हे हँसाना चाहा था, खुद बेवजह हंस कर
चुराना हमारा मकशद नही, बस दिल लगाना चाहा था !
दूर क्यों जाने लगे हो हमसे बिछड़ कर
हमने तो  बस यू ही आपको खुश देखना चाहा था !!

मैं नन्ही सी हूँ चली अकेले पाने अपने सपने

growth-emerging-new-plant-general-700x45_660

 

मैं नन्ही सी हूँ चली अकेले पाने अपने सपने

मन है मेरा उदास, पर उड़ने की है आस

इस कशमकश की वजह भी है कुछ खास

खुशी अपनो की, गम अपनो के

दुनिया क्या है पथ के काँटे या कुछ है जो दुख को बाँटे

पर ना मैं हू कभी डगमगाई, ना ही कभी मैं मुरझाई

बस अंतः वेदना मे चुप चुप कर अंश्रु बहाई

मैं नन्ही सी हूँ चली अकेले पाने अपने सपने

निकल आती हूँ बाहर इनसे बस कुछ पल के लिए ही है रुसवाई

बढ़ जाती हू आगे हर दिन ,पीछे कभी ना मूड पाई

जाना है दूर अभी तो मंज़िल अभी है आनी

कर लूँगी सब सपने अपने , बस कुछ बादल बरसने है बाकी

एक नयी सुबह की नयी किरण संग एक नयी उमंग है लानी

मैं नन्ही सी हूँ चली अकेले पाने अपने सपने

आँखों में उम्मीदें भर कर

Image

आँखों में उम्मीदें भर कर , लेकिन उन पर घूँघट ओढ़ें
सूरज की किरणों से तप कर  माँ तेरे तन पर पसीना छूटे
यशोधा बन कर भी तुम मेरी , देवकी माँ सी   क्यूँ तकलीफें झेलें

भोर में जग कर सबसे पहले तुम सूरज को भी जगलाती
घर आँगन महका कर के पनघट पर  से घगरिया लाती
बाबा की सेवा में तत्पर हमेशा फिर भीं उनसे रोज़ क्यूँ तू मार खाती
भर कर अंक में अपने मुझे  तुम,  रोज़ यहां काम पर  आती

सुला के नीम की  छाव  तले तुम काम पर  लग जाती
दिन भर  बहा के पसीना भी तुम शाम को साहब की फत्कारे  ही खाती
उसको भी तुम हंस कर  बस यु ही टाल जाती
जब मुझे  तुम दूध पिलाती,  तब माँ फिर क्यू तू चुप चुप अंश्रु बहाती

कब आएंगे  तुम्हारे खुशियों  के  दिन माँ जब बस तुम मुझे  गोद में उठाएँ खेल खिलाति 
माँ तुम मुजे भीं ये काम सीखा  दो और संग मुझे  अपने लगा लो
कर दूँगा सारा काम तुम्हारा  बस बदले में मुझे सीने से अपने लगा कर तुम मुस्कुरालो

कुछ पल सिर्फ अपने हो जिंदगी में |

Image

कुछ पल सिर्फ अपने हो जिंदगी में
जब में  और सिर्फ तुम हो पास में
बाते सिर्फ तब अपनी  ही हो
और खोने को तब कुछ ना हो 
बाहों  में एक दुसरे के हम हो
हंसी होंठो पर  हो और गम का कोई नाम ना  हो
अगर आँशु  भी गिरे नेनो से  तो वो नैन सिर्फ हमारे  हो 
कुछ पल सिर्फ अपने हो जिंदगी में
जब हवा में खुशबू  भी बस तेरे बदन की हो
बारिश की बूंदों में भीगे हुए वो दो चेहरे भी सिर्फ अपने हो
रात  में चांदनी हो पर  जगमाते हुए दो  सितारे सिर्फ हमारे हो 

Is this the Love and Is I am in the Love

Whimsical mind is mine but still staying on you
Just standing in a queue and eyes fixed on you
Few were the smiles and few were the cries when you arrived
Never tried or never did to fly and now I am above the sky
Never worried about and never thought about
Is this a cue to make the issue leading me to sue and imprison me inside you?
Oh god is this is the love and is I am in the love?

खुद को अकेला पाता हूँ ||||||||

Image

सोचता हूँ  कभी तो खुद को अकेला पाता हूँ  |
जिन्दगी जीना चाहता हूँ  पर जीने का मकशद भूल जाता हूँ |
जीने की ख्वाहिस नहीं  है फिर भी जीना चाहता हूँ |

जो कल मिले थे, अब  फिर नही मिलेंगे कभी जानता हू  मै या जानकर  भी क्यों भूल जाता हूँ |
वो हमसे दूर जाने लगे हैं  सोचता हूँ , समझता हूँ फिर भी रब से  पूछने क्यों लग जाता हूँ |
खुदा से अपनी मौत मांगता हूँ पर उनकी सलामति की दुआ क्यों मांग बैठता हूँ |

शायद वो आँखों मै बसे है हमारे  ये भूल  जाता  हूँ  ,पर  ये पागल दिल नही भूलता होगा उन्हें |
मर गया मै तो मर जाएगी ये  आंखे भी , सोच कर ही डर जाता हूँ ,हम तो मर कर भी जी लेंगे पर पर ये दिल कैसे भूलेगा वो लम्हे
उन्होंने तो कसम खा ही ली हैं  बिछुड़ने की पर , डगमगा तो जायेंगे हमारे ये कदम दो नन्हे नन्हे |

रात  की तनहाइयो  में रोता होगा उनका दिल भी, आंखे भी |
और उस  रात की गहराइयो  में ढूँढता हू  मै उनकी यादो की पर्छाइयो  को भी |
कभी तो सवेरा होगा मेरे इकरार का, पूछता हूँ मै ईश्वर को भी ,अल्ल्लाह को भी |

वो काली रात अमावस्या की आई उस  रात को खुदा ने भी सुनी हमारी |
मांगी जो सलामती की दुआ उनकी तो हमारी  सांसे ही निकल आई|
वो दोड़े चले आये  इकरार फिर इज़हार हुआ तो मरते शरीर में हमारे  जान आई  |

अश्रु गिरे उनको नैनो से तो हमारी मोहब्ब्हत की जीत हुई |
रोया हर एक पल , संग उनके  सारा संसार रोया |
वो गिरे बेदम हमारी लाश  पर तब असमान से भी फूलो की बरसात हुई |

आदत सी हो गयी है

अब तो बस ये आदत सी हो गयी है , बचपन से लेकर अब तक बस
अब तो ना सुनने की आदत सी हो गयी है |

बचपन था जब और मैं खेलने लगा था ,
कुछ खिलोनो के लिए रोने की आदत सी हो गयी थी |

स्कूल जाने लगा तो उस घंटी की आवाज से डरने लगा था ,
कुछ पल घर पर अकेले बिताने की आदत सी हो गयी थी |

बचपन में कहाँ दिल टुटा करते थे तब तो बस खिलोने ही टुटा करते थे ,
उन हसीं पलों को तो बस अब याद करने की आदत सी हो गयी है |

स्कूल और घर बस पढाई ही किया करते थे ,
अब तो हर क्लास में टॉप करने की आदत सी हो गयी है |

अब तो बस ये आदत सी हो गयी है , बचपन से लेकर अब तक बस
अब तो ना सुनने की आदत सी हो गयी है |

बीत गया बचपन अब तो जवानी आने में थी ,
मोहब्बत हुई उनसे तो उनके रूठने की आदत सी हो गयी थी |

वो हसीं परी थी मेरे ख्वाबो की और मै उस पर फ़िदा था ,
कुछ इसलिए ही उनको मनाने की आदत सी हो गयी थी |

एक दिन गए वो हम से रूठ कर ऐसे ,
की अब तो उनके इंतजार में पीने की आदत सी हो गयी है |

स्कूल से कॉलेज और कॉलेज से कही और ,
अब तो दोस्तों से बिछुड़ने की आदत सी हो गयी है |

सोसिअल नेट्वोर्किंग का जमाना ये आया है ,
कुछ इसलिए ही fb ,twitter पर मिलने की आदत सी हो गयी है |

अब तो बस ये आदत सी हो गयी है , बचपन से लेकर अब तक बस
अब तो ना सुनने की आदत सी हो गयी है |

समाज और देश को समझने लगा हूँ अब तो मै भी ,
तभी तो रिस्वत देने की आदत सी हो गयी है |

इंतजार है लोटने का अपने घर एक दिन ,
अब तो माँ के आंचल को तरसने की आदत सी हो गयी है |

कही खो ना जाऊ इस भीड़ मे मै अकेला ,
मुझे खोने की आदत सी हो गयी है |

मुझसे अब भी उम्मीदे रखी है किसी ने ,
बस उसी के सपनो को पूरा करने की आदत सी हो गयी है |

हर पल का पता नही मुझे ये जिन्दगी भी कितनी अजीब है |
कुछ इसी तरह ये जिन्दगी जीने की आदत सी हो गयी है |

अब तो बस ये आदत सी हो गयी है , बचपन से लेकर अब तक बस
अब तो ना सुनने की आदत सी हो गयी है |