मैं नन्ही सी हूँ चली अकेले पाने अपने सपने

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मैं नन्ही सी हूँ चली अकेले पाने अपने सपने

मन है मेरा उदास, पर उड़ने की है आस

इस कशमकश की वजह भी है कुछ खास

खुशी अपनो की, गम अपनो के

दुनिया क्या है पथ के काँटे या कुछ है जो दुख को बाँटे

पर ना मैं हू कभी डगमगाई, ना ही कभी मैं मुरझाई

बस अंतः वेदना मे चुप चुप कर अंश्रु बहाई

मैं नन्ही सी हूँ चली अकेले पाने अपने सपने

निकल आती हूँ बाहर इनसे बस कुछ पल के लिए ही है रुसवाई

बढ़ जाती हू आगे हर दिन ,पीछे कभी ना मूड पाई

जाना है दूर अभी तो मंज़िल अभी है आनी

कर लूँगी सब सपने अपने , बस कुछ बादल बरसने है बाकी

एक नयी सुबह की नयी किरण संग एक नयी उमंग है लानी

मैं नन्ही सी हूँ चली अकेले पाने अपने सपने

खुद को अकेला पाता हूँ ||||||||

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सोचता हूँ  कभी तो खुद को अकेला पाता हूँ  |
जिन्दगी जीना चाहता हूँ  पर जीने का मकशद भूल जाता हूँ |
जीने की ख्वाहिस नहीं  है फिर भी जीना चाहता हूँ |

जो कल मिले थे, अब  फिर नही मिलेंगे कभी जानता हू  मै या जानकर  भी क्यों भूल जाता हूँ |
वो हमसे दूर जाने लगे हैं  सोचता हूँ , समझता हूँ फिर भी रब से  पूछने क्यों लग जाता हूँ |
खुदा से अपनी मौत मांगता हूँ पर उनकी सलामति की दुआ क्यों मांग बैठता हूँ |

शायद वो आँखों मै बसे है हमारे  ये भूल  जाता  हूँ  ,पर  ये पागल दिल नही भूलता होगा उन्हें |
मर गया मै तो मर जाएगी ये  आंखे भी , सोच कर ही डर जाता हूँ ,हम तो मर कर भी जी लेंगे पर पर ये दिल कैसे भूलेगा वो लम्हे
उन्होंने तो कसम खा ही ली हैं  बिछुड़ने की पर , डगमगा तो जायेंगे हमारे ये कदम दो नन्हे नन्हे |

रात  की तनहाइयो  में रोता होगा उनका दिल भी, आंखे भी |
और उस  रात की गहराइयो  में ढूँढता हू  मै उनकी यादो की पर्छाइयो  को भी |
कभी तो सवेरा होगा मेरे इकरार का, पूछता हूँ मै ईश्वर को भी ,अल्ल्लाह को भी |

वो काली रात अमावस्या की आई उस  रात को खुदा ने भी सुनी हमारी |
मांगी जो सलामती की दुआ उनकी तो हमारी  सांसे ही निकल आई|
वो दोड़े चले आये  इकरार फिर इज़हार हुआ तो मरते शरीर में हमारे  जान आई  |

अश्रु गिरे उनको नैनो से तो हमारी मोहब्ब्हत की जीत हुई |
रोया हर एक पल , संग उनके  सारा संसार रोया |
वो गिरे बेदम हमारी लाश  पर तब असमान से भी फूलो की बरसात हुई |

आदत सी हो गयी है

अब तो बस ये आदत सी हो गयी है , बचपन से लेकर अब तक बस
अब तो ना सुनने की आदत सी हो गयी है |

बचपन था जब और मैं खेलने लगा था ,
कुछ खिलोनो के लिए रोने की आदत सी हो गयी थी |

स्कूल जाने लगा तो उस घंटी की आवाज से डरने लगा था ,
कुछ पल घर पर अकेले बिताने की आदत सी हो गयी थी |

बचपन में कहाँ दिल टुटा करते थे तब तो बस खिलोने ही टुटा करते थे ,
उन हसीं पलों को तो बस अब याद करने की आदत सी हो गयी है |

स्कूल और घर बस पढाई ही किया करते थे ,
अब तो हर क्लास में टॉप करने की आदत सी हो गयी है |

अब तो बस ये आदत सी हो गयी है , बचपन से लेकर अब तक बस
अब तो ना सुनने की आदत सी हो गयी है |

बीत गया बचपन अब तो जवानी आने में थी ,
मोहब्बत हुई उनसे तो उनके रूठने की आदत सी हो गयी थी |

वो हसीं परी थी मेरे ख्वाबो की और मै उस पर फ़िदा था ,
कुछ इसलिए ही उनको मनाने की आदत सी हो गयी थी |

एक दिन गए वो हम से रूठ कर ऐसे ,
की अब तो उनके इंतजार में पीने की आदत सी हो गयी है |

स्कूल से कॉलेज और कॉलेज से कही और ,
अब तो दोस्तों से बिछुड़ने की आदत सी हो गयी है |

सोसिअल नेट्वोर्किंग का जमाना ये आया है ,
कुछ इसलिए ही fb ,twitter पर मिलने की आदत सी हो गयी है |

अब तो बस ये आदत सी हो गयी है , बचपन से लेकर अब तक बस
अब तो ना सुनने की आदत सी हो गयी है |

समाज और देश को समझने लगा हूँ अब तो मै भी ,
तभी तो रिस्वत देने की आदत सी हो गयी है |

इंतजार है लोटने का अपने घर एक दिन ,
अब तो माँ के आंचल को तरसने की आदत सी हो गयी है |

कही खो ना जाऊ इस भीड़ मे मै अकेला ,
मुझे खोने की आदत सी हो गयी है |

मुझसे अब भी उम्मीदे रखी है किसी ने ,
बस उसी के सपनो को पूरा करने की आदत सी हो गयी है |

हर पल का पता नही मुझे ये जिन्दगी भी कितनी अजीब है |
कुछ इसी तरह ये जिन्दगी जीने की आदत सी हो गयी है |

अब तो बस ये आदत सी हो गयी है , बचपन से लेकर अब तक बस
अब तो ना सुनने की आदत सी हो गयी है |